विशेष लेख


Special Article vol. 21

70 वर्ष: भारत की वैश्विक शक्ति बनने की साहसिक यात्रा

शिवाजी सरकार

आज़ादी के बाद के 70 वर्ष एक कठिन यात्रा रही है। आज़ादी हासिल करना आसान नहीं था। अभी तक देश ने कई उल्लेखनीय प्रगतियां की हैं, बहुत-सी राजनीतिक समस्याओं को सुलझाया, परमाणु शक्ति बन गया और भारतीय वैज्ञानिकों के कठोर प्रयासों के फलस्वरूप अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में अग्रणी हो गया और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से वैश्विक विनिर्माण हब बन रहा है।

पूर्ण स्वराजका सपना छोटा हो गया था। देश का विभाजन अनकहे दुख लेकर आया। भारत का लगभग एक तिहाई हिस्सा, व्यापक वित्त और अन्य परिसंपत्तियां छीन ली गईं।

सबसे बुरा घटनाक्रम आज़ादी की घोषणा के बाद जनसंख्या का स्थानांतरण था। यह दुनिया में लोगों के विस्थापन की सबसे बड़ी दुखद घटना थी जो अपने घरों को छोडक़र जाने के अनिच्छुक थे। चहुं ओर तबाही का आलम था। दंगों में लाखों लोग मारे गये। लाखों लोगों को देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में नई राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत जाने के लिये मज़बूर होना पड़ा। बहुत से परिवार अत्याचारों का शिकार हुए। वे सब कुछ छोडक़र लगभग खाली हाथ भारत आये और अपने परिवार के सदस्यों को भी खो दिया।

घाव बरकरार थे। राजनीतिक गिरावट अब भी देश के उत्तरी और पूर्वी भागों के बीच रुकावट बनी हुई थी। नेहरू-लियाक़त अली (एनएलए) समझौते में पूर्वी हिस्से से शरणार्थियों को ‘‘विस्थापित व्यक्ति‘‘ घोषित कर दिया गया जिसका अर्थ है कि वे पूर्वी पाकिस्तान के हिंसा प्रभावित, दंगों से ग्रसित हिस्सों में वापस जायेंगे। ये कभी नहीं हुआ। पूर्व के ‘‘विस्थापितों’’ को पश्चिम के ‘‘शरणार्थियों’’ की तरह प्रतिपूर्ति के तौर पर कोई पैसा नहीं दिया गया। कई लोग दृढ़ता के साथ कहते हैं कि यहां तक कि नक्सलवाद जैसे कुछेक हिंसक आंदोलन इसी समझौते का दुष्परिणाम था क्योंकि इसने पूर्वी पाकिस्तान से आने वालों को बुरी तरह साधनहीन बना दिया। इसने पश्चिम बंगाल और बहुत से उत्तर-पूर्वी राज्यों की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना जारी रखा। इन हिस्सों में उपद्रवों और प्रदर्शनों ने बाधाएं पहुंचाई।

पड़ौसी देश का छदम युद्ध कई तरह से जारी है जिसमें नशीले पदार्थ आतंकवाद और जम्मू एवं कश्मीर सहित विभिन्न हिस्सों में घृणा फैलाने के उसके प्रयास शामिल हैं। जम्मू एवं कश्मीर का परिग्रहण तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के शासन कौशल और इसके बाद सैन्य कार्रवाई के कारण संभव हो पाया था।

देश अब भी जूझ रहा है। यहां तक कि वे क्षेत्र, जो विभाजन की आपदा से प्रभावित थे, चाहे ये पंजाब हो, पश्चिम बंगाल अथवा असम, वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। जी हां, पंजाब, इसकी खुशहाल कृषि-अर्थव्यवस्था के कारण दशकों से बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य पूर्वी राज्यों से रोजग़ार की तलाश करने वाले लोगों के सपनों का गंतव्य स्थान बना रहा है।

कोलकाता, पूर्ववर्ती कलकत्ता, बहुत से अन्य छोटे शहरों जैसे कि हैदराबाद, बंगलुरू, नोएडा और गुरूग्राम की तरह गतिविधियों के एक नये हब के तौर पर उभर रहा है। गुजरात और तमिलनाडु जैसे कई अन्य राज्य गतिविधियों का केंद्र बन गये जो कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।

यह भारतीय सांख्यिकी संस्थान के संस्थापक, प्रशांत महालानबिस के नेतृत्व में योजना प्रक्रिया से संभव हो पाया है। योजना आयोग ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में प्रथम पंचवर्षीय योजना के शुभारंभ के साथ नई उद्योग आधारित प्रक्रिया की शुरूआत की। इसने देश में बड़े और बाद में मेगा बिजली उत्पादन केंद्रों, भाखड़ा-नंगल जैसे बड़े बांधों की स्थापना की प्रक्रिया आरंभ की। यह एक मार्ग अपनाया गया था।

पांच वर्ष के भीषण अकाल के दौरान जबर्दस्त खाद्य संकट को देखते हुए हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्नों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बना दिया। खामियों के बावजूद योजना प्रक्रिया में परिवर्तन लाये जा रहे हैं और अब इसे नीति आयोग के जरिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किये गये 20-वर्षीय दृष्टिकोण के अनुरूप ढालने के प्रयास किये जा रहे हैं।

हरित क्रांति भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा इंस्टीट्यूट के तौर पर लोकप्रिय संस्थान और अन्य सरकारी संगठनों द्वारा शुरू की गई अनुसंधान कार्यक्रमों की शृंखला के कारण संभव हो पाई थी।

आज़ाद भारत का सपना बहुत बड़ा था। होमी जहांगीर भाभा के अधीन इसने परमाणु कार्यक्रम के शांतिपूर्ण उपयोग के लिये छोटे अप्सरा रिएक्टर के साथ एक अनुसंधान कार्यक्रम की स्थापना की। उनके सपनों के संस्थान भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) ने आम लोगों की सहायता से जुड़े अध्ययन शुरू किये। इसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्वीकृति से 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया। इससे दुनिया दंग रह गई और सदमे में आकर पश्चिमी देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिये।

यह एक वरदान था। बीएआरसी और परमाणु वैज्ञानिकों ने कई परमाणु सुविधाओं में अपने आप प्रौद्योगिकी के कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम संचालित किये।

इन प्रयासों ने सुपर कम्प्यूटर, रोबोटिक्स, कृषि, बागवानी, चिकित्सा, ग़ैर विनाशकारी औद्योगिक और चिकित्सा अन्वेषण और कई अन्य क्षेत्रों में योगदान किया। इसके फलस्वरूप 1998 में दूसरा परमाणु परीक्षण संभव हो सका। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अधीन इस टीम का नेतृत्व पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने किया। अंतत: पश्चिमी देशों ने महसूस किया कि प्रतिबंध इस देश को बाधित नहीं कर सकते।

उन्होंने इन्हें हटाना शुरू कर दिया। आज भारत सर्वोच्च वैश्विक परमाणु अप्रसार संधि व्यवस्था से जुडऩे के लिये तैयार है। यह पहले ही प्रक्षेपास्त्र प्रौद्योगिकी नियंत्रण तंत्र (एमटीसीआर) का हिस्सा बन चुका है। भारत को बगैर इसके किसी दोष के चार दशकों तक इससे दूर रखा गया।

प्रतिबंधों ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान को भी प्रभावित किया। परंतु भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने भी बीएआरसी और कई अन्य वैज्ञानिक संगठनों के साथ मिलकर कई क्षेत्रों में प्रणालियां विकसित की और बहुत से वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान केंद्रों के जरिये प्रणाली का विकास किया। मंगल के लिये इसरो का मिशन और विभिन्न दूसरे उपग्रहों ने संचार परिदृश्य को ही बदल दिया है। आज इसरो अमरीका, फ्रांस और रूस के वैश्विक अंतरिक्ष संगठनों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहा है।

विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक नेतृत्व ने इन प्रयासों के प्रति समर्थन प्रदान किया है। परंतु उसके बिना रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) पृथ्वी, अग्नि, हल्के लड़ाकू विमान जैसी शस्त्र, संचार और मिसाइल प्रणालियों, मुख्य युद्धक टैंक, पैराशूट, हल्के स्नो सूट्स और अन्य अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के लिये प्रयास नहीं कर सकता था। इसके द्वारा विकसित खाद्य संरक्षण प्रणाली जो कि सियाचीन जैसे दूरदराज के क्षेत्रों में अभियानों के लिये समर्थन कर रहा है, निजी क्षेत्र को अंतरित कर दिया गया।

प्रतिबंधों ने भारतीय वैज्ञानिक समुदाय के बीच वह सब कुछ सृजित करने का एक विशिष्ट तालमेल, उत्साह और जोश भर दिया, जिसे अब राजनीतिक तौर पर सुपर पावरका नाम दिया गया है। यह भारत सुपर पावर की तरफ कदम बढ़ा रहा है कोई भी विभिन्न क्षेत्रों में इसके वैज्ञानिकों के प्रयासों को नहीं भुला सकता है-जो कि वास्तव में एक गुमनाम नायक हैं।

कुछेक को याद होगा कि प्रमुख राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), हैदराबाद के गहन अध्ययन ने देश भर में हाइड्रो-कार्बन भण्डारों की खोज़ की है। इसके फलस्वरूप एनईएलपी के नाम से राष्ट्रीय अन्वेषण लाइसेंस प्रणाली कायम की जा सकी। आज ये देश की लगभग एक तिमाही पेट्रोलियम आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।

यदि आज प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) हासिल करने के लिये भारत के द्वार खुले हैं, यह वैज्ञानिकों के खून पसीने की वजह से संभव है। अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और उद्योग महसूस करते हैं कि भारत को देश के विभाजन, प्रतिबंधों अथवा अन्य आक्रामक उपायों जैसे राजनीतिक विभाजन के जरिये वश में नहीं किया जा सकता। इसमें अपने दम पर खड़ा होने की अदम्य शक्ति है।

इसने ऐसा अनेक बार कर दिखाया है। सोवियत संघ (यूएसएसआर) के साथ भारत की 25 वर्ष की मैत्री 1989 में उस वक्त बाधित हो गई थी जब वहां कम्यूनिस्ट व्यवस्था भंग हो गई और वह रूस के तौर पर पुन: उभरकर आया। पश्चिम के कई देशों ने सोचा था कि भारत भी यूएसएसआर के साथ इसके निकट संबंधों, रुपये व्यापार, हथियार संधियों और कई अन्य संबद्धताओं के कारण लडख़ड़ा जायेगा।

कुछ भी नहीं हुआ, थोड़े से अंतराल के बाद जब चार महीने की चंद्रशेखर सरकार ने अपनी मुद्रा ज़रूरतों को संचालित करने के लिये बैंक ऑफ इंग्लैंड को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था, भारतीय अर्थव्यवस्था ने पुनरावर्तन दर्शाया। इस झटके ने एक नई उदार-वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म दिया।

परंतु भारत ने अपने द्वार खुले रखे। 1980 में इसने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से विशेष लोकतांत्रिक अधिकार (एसडीआर) प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। दो वर्ष बाद यह घोषणा की गई कि भारत को सभी एसडीआर प्राप्त नहीं हो रहे हैं और जो कुछ इसे प्राप्त हुआ था उसका पुनर्भुगतान कर रहा है। इस चरण में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने के प्रयास सुस्त थे।

किसी को भी यह भूलने की आवश्यकता नहीं है कि इसी समय के दौरान जापानी निवेश के साथ मारूति कार उद्योग की शुरूआत की गई थी। इसने देश के ऑटोमोबाइल परिदृश्य को बदल दिया। इसे लाइसेंस-परमिट राज के अंत की शुरूआत के तौर पर भी देखा गया, जिसमें दशकों से तथाकथित दो देसी कारवालों ने प्रतिस्पर्धा को रोककर भारत के विकास में गतिरोध पैदा कर रखा था।

यदि आज भारत विश्व का कार निर्माण पंसदीदा उत्पादन केंद्र बन रहा है तो इसमें मारूति के योगदान को सदैव याद किया जायेगा। यह न केवल नई कार लेकर आया बल्कि नई कार्य संस्कृति, श्रम कल्याण और ट्रेड यूनियन नीतियों में बदलाव लेकर आई। इसने गुजरात का सोना, आभूषण और हीरे की पॉलिशिंग, साफ्ट ड्रिंक्स, एपैरल, मशीनरी, कृषि, बीजों, रेलवे ईंजनों, मेट्रो ट्रेन कोचों और कई अन्य क्षेत्रों में निवेश का वातावरण खोल दिया।

इससे सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश का उदय हुआ और भारतीय नाम जैसे कि इन्फोसिस, विप्रो और कई अन्य कंपनियों की शुरूआत हुई। देश में वैश्विक बिजऩेस प्रोसेसिंग संगठन (बीपीओ) क्षेत्र की बाढ़ आ गई। यह नहीं भूलना चाहिये कि यह सैम पित्रोदा के नेतृत्व वाले सी-डैक के अधीन धीरे-धीरे घटित हो रहा है। पित्रोदा की पहल ने दूरसंचार परिदृश्य को बदल डाला है। ट्रंक काल्स को बदलकर एसटीडी डायलिंग संपर्क की शुरूआत की गई जिसे अब सरकार द्वारा संचालित भारत संचार निगम वन इंडिया‘‘ के तौर पर पुकारा जाता है। आज के 2जी, 3जी और 4जी की जड़ें 1980 के मध्य में हुए प्रयासों में मौजूद हैं। इसने इस क्षेत्र में निजी भारतीय और बहुर्राष्ट्रीय भागीदारों के लिये नये क्षेत्र खोल दिये।

आईटी-आधारित ऑनलाइन बाज़ारों के साथ-साथ आईटी और दूरसंचार मिलकर आज सबसे बड़े नियोक्ता हैं।

भारत शुरू से ही सुधारों की तलाश में रहा है। विदेशी जीवन बीमाकर्ताओं ने 1950 में उस वक्त कहर बरपा दिया जब उन्होंने रातोंरात अपनी दुकानें बंद कर दी और गऱीब निवेशकों के अपने उदीयमान दिनों में अरबों रुपये खो दिये। इसने बीमा के राष्ट्रीयकरण और सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े वित्त संगठन जीवन बीमा निगम को जन्म दिया जिसने बाद में भारत के विकास में जबर्दस्त निवेश किया। 1960 के दशक में सामान्य बीमा का भी राष्ट्रीयकरण किया गया और जीआईसी का गठन किया गया। यह निवेशकों को बचाने और बीमा व्यवसाय को सुचारू बनाने के लिये किया गया।

1969 में इंदिरा गांधी सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करते हुए लोगों के धन को संरक्षा प्रदान करते हुए व्यापक सुधार किया। आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक व्यापक अनर्जक परिसंपत्तियों के बावजूद विकास के स्वप्न को हासिल करने में योगदान कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समावेशी आर्थिक विकास के लिये ऐसे लाखों लोगों के लिये ‘‘जन धन‘‘ की योजना शुरू की है जिनके बैंक खाते नहीं थे। इससे बैंकिंग क्षेत्र में 17000 करोड़ रुपये जमा हुए जो कि बहुत ज़्यादा अमीर लोगों के नहीं हैं।

रोजग़ार क्षेत्र पर हमेशा केंद्र बिंदु के तौर पर रहा है। 1970 के दशक में उद्योग में नई प्रतिभाओं के प्रवेश के लिये प्रशिक्षुता अधिनियम लागू किया गया। अब मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट अप, स्टैंड अप, मुद्रा और कई अन्य योजनाएं हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं।

अब कुछ अंतर है। समय के साथ दृष्टिकोण में बदलाव आया है। अब उद्यमशीलता पर भी ज़ोर है। युवा प्रतिभाएं उद्यमशीलता की तरफ मुड़ रही हैं और रोजग़ार ढूंढने की बजाये मुद्राा जैसे कार्यक्रमों के जरिये रोजग़ार प्रदान कर रही हैं।

देश को कुछेक समस्याओं का भी सामना करना पड़ा है। 1962 चीन की घुसपैठ, 1948, 1965 और 1971 में पाकिस्तान के आक्रमण  ने इसके संकल्प को ही मज़बूत किया है। इसने न केवल अपनी सैन्य ताकत को मज़बूत करने का प्रयास किया बल्कि अपनी खुद की प्रणालियां भी तैयार कीं। पाकिस्तान के विरुद्ध 1971 के युद्ध से एक नये राष्ट्र, बंगलादेश का जन्म हुआ। यह नया देश आज सडक़, रेल और नौवहन संपर्क में सहयोग करते हुए भारत की पूर्वात्तर क्षेत्र के एकीकरण और विकास में सहायता कर रहा है। इस प्रक्रिया में भारत भी बंगलादेश की उसकी अर्थव्यवस्था के विकास और मज़बूती के लिये मदद कर रहा है।

अंतत: 2014 में नरेंद्र मोदी के अधीन सही अर्थों में एकल पार्टी का प्रभुत्व कायम हुआ, जिन्होंने भाजपा को शानदार जीत दिलाई और एक नई समावेशी अर्थव्यवस्था और राजनीति की शुरूआत हुई।

नई कूटनीति भारतीय उपमहाद्वीप में परिवर्तन ला रही है। अफगानिस्तान, ईरान, श्रीलंका, भूटान, बंगलादेश, म्यामां के साथ निकट संबंधों से न केवल इन देशों को मदद मिल रही है बल्कि दक्षिण पूर्वी एशिया और मध्य एशिया में विकास के नये मार्ग खुल रहे हैं।

यमन और पश्चिम एशिया में भारतीय अभियानों ने 26 देशों के नागरिकों को सुरक्षित निकालने का रिकार्ड कायम किया है। अब सऊदी अरब से 10,000 भारतीय कामगारों की सुरक्षित निकासी के इसके प्रयास दर्शाते हैं कि देश की न केवल अपने लोगों के प्रति सहानुभूति है बल्कि वह उन क्षेत्रों में भी हाथ बढ़ाने की क्षमता रखता है जहां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इसकी ज़रूरत होती है।

इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि यह अमरीका, जापान, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ तथा अफ्रीका और लातिन अमरीका जैसी शक्तियों से संबद्ध हो रहा है।

70 वर्षों में बहुत से उतार चढ़ाव देखे गये हैं परंतु जिस मार्ग पर देश चल रहा है और उप महाद्वीप को अपने निकट ला रहा है, अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में उल्लेखनीय प्रगति हासिल किये जाने की आशा है यह मज़बूत विनिर्माण और कृषि आधार के साथ मज़बूत अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है।

 

(लेखक एक पत्रकार और शिक्षाविद हैं। ई-मेल:shivajisarkar@yahoocom)