विशेष लेख


volume-40,5 - 11 January

 

 

 

उच्च शिक्षा में नवाचार केंद्रित पहल

 

इंद्रानिल मन्ना

उच्च शिक्षा वह है जो हमें केवल ज्ञान नहीं देती बल्कि हमारे जीवन में अस्तित्व के साथ समरसता लाती है

- रवींद्रनाथ टैगोर

भारत में 1.25 करोड़ लोगों को उच्च या तृतीयक स्तर की शिक्षा प्रदान करने के लिए लगभग 800 विश्वविद्यालय (केंद्रीय, राज्यीय, निजी, डीम्ड तथा अन्य श्रेणियों सहित) हैं. इनमें से अधिकतर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा संचालित होते हैं. देश में लगभग सौ राष्ट्रीय महत्व के संस्थान हैं जिनकी स्थापना संसद या राज्य विधानसभाओं के विशेष अधिनियमों के जरिए की गई है जो प्रत्यक्ष रूप से केंद्र या राज्य सरकार को रिपोर्ट करते हैं. राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में प्रसिद्ध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान शामिल हैं. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की शृंखला देश के उच्च प्रौद्योगिकी संस्थानों का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें आधुनिकतम पाठ्यक्रम और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं. कई राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों और इंजीनियरिंग विभागों का योगदान और उपलब्धियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. उच्च शिक्षा के अन्य संस्थानों की तरह, इंजीनियरिंग संस्थान भी मुख्य रूप से केवल ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करते हैं. वे या तो ज्ञान का प्रसार करते हैं (शिक्षण से) या नए आविष्कार करते हैं (अनुसंधान से). देश की सेवा करने और प्रासंगिक बने रहने के लिए इंजीनियरिंग की शिक्षा को परंपरागत शैली से अलग एक विशेष दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जिसमें केवल व्याख्यान, लेख, एकालाप, पाठ्य पुस्तकें शामिल होती हैं. इनमें आविष्कार नवाचार के लिए प्रयोगात्मक प्रशिक्षण के बिना डिग्री होती है.

विज्ञान-इंजीनियरिंग-प्रौद्योगिकी संबंध

विज्ञान-इंजीनियंरिग-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सफल कार्यों से आविष्कार (एक नया कानून, तत्व या यौगिक पदार्थ, गोचर वस्तु), नई खोज (एक नया सिद्धांत, उपकरण, औषधि, मशीन, प्रक्रिया) और नवाचार क्रमश: (एक नया तथा किफायती उत्पाद या प्रक्रिया). अत: इंजीनियरिंग शिक्षा को समाज की आवश्यकताओं से मुद्दों के समाधान के लिए प्रासंगिक वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए, जैसे उच्च शक्ति सामग्री, अधिक थर्मल/विद्युत चालकता, सस्ती स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं, सतत् ऊर्जा संसाधन और कार्बन, फुटप्रिंट, कुशल उपकरण/मशीनों इत्यादि के लिए निवारक उपाय इत्यादि.

नवाचार संवद्र्धन के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय की पहल

हाल के समय में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग ने उच्च शिक्षा को अधिक व्यापक और प्रभावी बनाने के लिए कई नए और नवाचार कार्यक्रम शुरू किए हैं और उच्च शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण सकारात्मक परिवर्तन किए हैं. इनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं:

अनुसंधान और नवाचार: उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए स्टार्ट अप इंडिया पहल

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने, 21वीं सदी को नवाचार की सदी घोषित किए जाने और 2010-20 के दशक का नवाचार दशक के रूप मेें समर्पित करने की प्रधानमंत्री की इच्छा के अनुरूप मानव संसाधन विकास मंत्रालय नवाचार प्रकोष्ठ की स्थापना की है. मंत्रालय ने नवाचार उपलब्धियों के बारे में संस्थानों की रैंकिंग की शुरुआत की है ताकि देशभर के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में नवाचार संस्कृति को व्यवस्थित रूप से बढ़ावा दिया जा सके. इसके लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित और शिक्षित किया जाता है ताकि वे नई-नई जानकारियों की खोज कर सकें और नए उत्पाद बना सकें तथा एक दिन सफल उद्यमी बन सकें. विद्यार्थियों में नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने, इसके प्रति जागरूकता पैदा करने के अनुकूल माहौल बनाने और देश को नए भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर करने के लिए ऐसे 1000 नवाचार केंद्र स्थापित करने का विचार है जो स्टेंडफोर्ट और एमआईटी जैसे संस्थानों से प्रतिस्पर्धा कर सकें.

अकादमिक नेटवर्क के लिए वैश्विक पहल (ज्ञान)

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नए कार्यक्रम अकादमिक नेटवर्क-ज्ञान की वैश्विक

पहल का उद्देश्य विज्ञान और उद्यम क्षेत्र के प्रतिभावान वैज्ञानिकों को भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ाने के लिए आमंत्रित करना और अनुसंधान में भागीदार बनाना है. कार्यक्रम-ज्ञान के तहत शिक्षण संस्थानों में पेशेवर गुणवत्ता में वृद्धि होगी और भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी संबंधी मानकों का उन्नयन कर वैश्विक स्तर का किया जाएगा.

सहयोग द्वारा अकादमिक अनुसंधान और संवर्धन योजना:

सहयोग द्वारा अकादमिक अनुसंधान और संवर्धन योजना, दुनिया के सर्वोत्तम संस्थानों तथा भारतीय संस्थानों के बीच शिक्षण तथा अनुसंधान सहयोग से, भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान की स्थिति में सुधार के लिए ज्ञान के बाद, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की नई और तार्किक अनुवर्ती पहल है.

शिक्षा न केवल नए-नए शोधों और उनके नतीजों के लाभ उठाने के लिए

लोगों को प्रभावी रूप से प्रशिक्षित करने का एकमात्र तरीका है बल्कि यह

हमारे साथ-साथ भावी पीढिय़ों के लिए भी वातावरण को बेहतर, सुरक्षित और

स्वस्थ बनाने में लोगों को सक्रिय भागीदार और योगदान करने में सक्षम

 बनाती है

 इस योजना के तहत विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए 600 संयुक्त अनुसंधान प्रस्तावों के वास्ते दो वर्ष तक वित्त पोषण किया जाएगा. भारतीय संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं और वैज्ञानिकों की कमी हमारी रैंकिंग पर प्रतिकूल असर डालती है. सहयोग द्वारा अकादमिक अनुसंधान और संवर्धन योजना, विश्वविद्यालयों को इस कमी को पूरा करने और नए आविष्कारों तथा नवाचार में मदद कर सकती है.

डिजिटल इंडिया-ई-लर्निंग

डिजिटल इंडिया-ई-लर्निंग: वचुअर्ल क्लासरूम और मैसिव ओपन ऑनलाइन पाठ्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालय के बाहर, लाखों युवाओं को बड़ी प्रवेश/शिक्षण फीस का भुगतान किए बिना या जेईई या अन्य प्रवेश परीक्षाओं के बिना आसानी से सर्वोत्तम तरीके से गुणवत्ता वाले शिक्षण और शिक्षण पाठ्यक्रमों तक पहुंचने में सक्षम बनाना है. मैसिव ओपन ऑनलाइन पाठ्यक्रम में संकाय के साथ संवाद सीमित होता है, परीक्षाएं ली जाती हैं और रोज़गार प्राप्ति के लिए प्रमाण पत्र भी दिया जाता है.

अनुसंधान तथा नवाचार: डिज़ाइन नवाचार के लिए राष्ट्रीय पहल

समझा जाता है कि डिज़ाइन केंद्रित नवाचार बहुत प्रभावी हो सकता है जो भारत में वैल्यू चेन को बढाऩे और उद्योगों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद कर सकता है. इस कार्यक्रम के तहत 20 नए डिज़ाइन नवाचार केंद्र, 1 ओपन डिजाइन स्कूल और 1 राष्ट्रीय डिज़ाइन नवाचार नेटवर्क की स्थापना करने की योजना है.

उच्चतर आविष्कार योजना

उच्चतर आविष्कार योजना के तहत उद्योग प्रायोजित, परिणामोन्मुखी अनुसंधान परियोजनाओं को 2016-17 से दो वर्ष के लिए 475 करोड़ रुपये का लागत व्यय दिया गया है. इस योजना की 50 प्रतिशत लागत का वहन मानव संसाधन विकास मंत्रालय और 25-25 प्रतिशत का वहन उद्योग और मेजबान संस्थान करता है. इस योजना का उद्देश्य भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में नवाचार को बढ़ावा देना है. इसके लिए विनिर्माण उद्योगों से जुडक़र, नवाचार सोच को बढ़ावा देकर और शिक्षा संस्थानों तथा उद्योग के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया जाता है.

उच्च शिक्षा संस्थानों में नवाचार-इम्प्रिंट

अब यह सवाल बड़ा प्रासंगिक हो जाता है कि इसके बाद क्या?

भारत सरकार ने देश में नवाचार विशेषकर आईआईटी, एनआईटी और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हाल में एक नई और अनूठी योजना शुरू की है जिसे इम्प्रिंट कहा जाता है, यानी अनुसंधान नवाचार और प्रौद्योगिकी को प्रभावित करने वाली योजना. इसका मुख्य उद्देश्य अनुसंधान से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल व्यवहार्य प्रौद्यिगिकी (उत्पाद या प्रक्रिया) में करना है. अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की पहल कोई नई नहीं है. फिर भी इम्प्रिंट की कल्पना क्यों की गई? इम्प्रिंट के बारे में अलग क्या है? आइए, सबसे पहले इन दोनों मुद्दों का समाधान करते हैं.

जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत अपने 2.5 ट्रिलियन डॉलर के सकल घरेलू उत्पाद के साथ दो अंकों की विकास दर पर नजर टिकाने वाली विश्व में एक बड़ी ताकत है जिसके पास 1.25 बिलियन जनसंख्या है, जिसमें से 800 मिलियन 35 वर्ष से कम आयु की है. इतना ही नहीें भारत 28 वर्ष की औसत आयु के साथ जल्द ही दुनिया का सबसे युवा देश बन सकता है. इसके साथ ही वास्तविकता यह भी है कि हमारा देश ऊर्जा/विज्ञान संबंधी/साइबर सुरक्षा, पेय जल की कमी, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन, गरीबी, बेरोज़गारी और करोड़ों लोगों के लिए शिक्षा तथा स्वास्थ्य देखभाल की बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है. इनमें से अधिकतर चुनौतियों से निपटने के लिए इंजीनियरिंग और तकनीकी नवाचार की आवश्यकता है. माननीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने, देश के सामने सभी इंजीनियरिंग और तकनीकी चुनौतियों से निपटने के लिए 5 नवंबर, 2015 को राष्ट्रपति भवन से एक राष्ट्रव्यापी अनूठी पहल- इम्प्रिंट की शुरुआत की. इसके शुरुआती संस्करण की अभिकल्पना, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा रूपांतरणीय अनुसंधान के समावेशी तथा सतत् तरीकों से राष्ट्रीय पहल के रूप में की गई थी.

इम्प्रिंट

इम्प्रिंट, सामान्य शोध पहलों से अलग है क्योंकि (1) यह केवल सृजन के लिए नहीं है बल्कि व्यवहार्य प्रौद्योगिकी में ज्ञान के अंतरण के लिए है (2) यह देश के सामने न केवल एक, बल्कि सभी प्रौद्योगिकीय चुनौतियों के लिए है (3) यह मंत्रालय से उद्योग तक सभी संबद्ध पक्षों को शामिल करते हुए क्राउड सोर्सिंग के समावेशी मॉडल पर निर्भर करती है. नतीजतन इम्प्रिंट के प्रारंभिक चरण ने शिक्षा में शोधकर्ताओं के बीच अभूतपूर्व उत्साह पैदा किया. शुरुआती 2612 प्रस्तावों में से केवल 259 का चयन किया गया और अब 142 परियोजनाएं तीन वर्ष के लिए 485 करोड़ रुपये के परिव्यय से चल रही हैं. इम्प्रिंट-1 के तहत अब तक 200 से अधिक समीक्षाओं और लगभग 25 पेटेंट आवेदकों तथा आविष्कारों का प्रकाशन कर लिया है. विभिन्न परियोजनाओं में लगभग 250 से अधिक कर्मी कार्यरत हैं जिनमें लगभग 100 पीएचडी शोधछात्र और 50 पोस्ट डॉक्टोरेट शामिल हैं. सभी 142 परियोजनाओं की प्रगति के प्रचार के लिए इम्प्रिंट की वेबसाइट website (https://imprint-india.org/knowledge-portal)  पर एक नए नॉलेज पोर्टल की शुरुआत की गई है. इस पर मासिक आधार पर प्रत्येक परियोजना की खोज, प्रगति और महत्वपूर्ण नतीजों तथा उपलब्धियों को दर्शाया जाता है. इनके अलावा ज्ञान (प्रकाशन, रिपोर्ट, पेटेंट) और सुविधाओं (यंत्र, उपकरण, प्रयोगशाला), मानव संसाधन (विद्यार्थी, शोधछात्र), प्रशिक्षित कर्मी, प्राप्त/ इस्तेमाल किए गए संसाधन, सहयोग (उद्योग तथा भागीदारों के साथ) और जारी इम्प्रिंट 1 अनुसंधान परियोजना के तहत प्रोटोटाइप, प्रायोगिक या उत्पाद विकास भी शामिल हैं. यह पोर्टल परियोजनाओं के तर्कसंगत नतीजे आने तक सक्रिय रहेगा. इन सभी उत्पादों और नमूनों की फरवरी 2019 में प्रदर्शनी लगाई जाएगी जिसका उद्घाटन माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर करेंगे.

इम्प्रिंट-2

इम्प्रिंट 1 की सफलता से प्रोत्साहित होकर अधिक समग्र रूप में इसके एक नये संस्करण की योजना बनाई गई जिसे इम्प्रिंट-2 के नाम से जाना जाता है. इसके लिए समाधान विकास की मांग आधारित नीति अपनाई गई है और इसमें राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं को भी शामिल किया गया है ताकि इसे इस्तेमालकर्ताओं की जरूरतों के अनुरूप और आसानी से अपनाने योग्य बनाया जा सके. राष्ट्रीय सहयोगकर्ताओं के साथ मिलकर काम करने के लिए इम्प्रिंट- 2 के कार्यान्वयन के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड को नोडल एजेंसी बनाया गया है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों, विशेषकर आईआईटी, एनआईटी, आईआईएसईआर, आईआईआईटी या सीयू में काम कर रहे, भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित उच्च शिक्षा संस्थानों के संकाय सदस्य और शोधकर्ता इम्प्रिंट- 2 में अपने प्रस्ताव भेज सकते हैं. इम्प्रिंट- 2 मुख्य जांचकर्ता के रूप में हितधारकों की आवश्यकताओं की समुचित सूची बनाएगा और इस पहल के तहत विकसित किए जा सकने वाले विभिन्न उत्पादों/प्रौद्योगिकियों/ज्ञान आधारित कार्यकलापों का खाका तैयार करेगा

सोलर पावर ट्री (सौर ऊर्जा वृक्ष)

आविष्कारकर्ता: सीएसआईआर-सीएमईआरआई

केंद्रीय यांत्रिक इंजीनियरी अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीएमईआरआई) द्वारा विकसित, सोलर

पावर ट्री (सौर ऊर्जा वृक्ष) परंपरागत व्यवस्था के समान विद्युत उत्पादन (5 घरों के लिए पर्याप्त विद्युत)

 करता है, लेकिन इसके लिए अपेक्षाकृत कम स्थान की आवश्यकता पड़ती है. इस्पात की बनी शाखाओं के

विभिन्न स्तरों ‘‘सोलर ट्री’’ पर फोटोवोल्टेइक पैनल रखे जाते हैं, जिससे सोलर पार्कों का विकास करने के लिए

 अपेक्षित भूमि में महत्वपूर्ण कमी आती है. सोलर पावर ट्री भू-आधारित सोलर व्यवस्थाओं की तुलना में 10

से 15 प्रतिशत तक अधिक सौर ऊर्जा का दोहन करते हैं. सोलर ट्री एक बैटरी बैक-अप प्रणाली को प्रभारित करते

 हैं, जो पूर्ण प्रभारित होने की स्थिति में सूर्यास्त के बाद 2 घंटे तक प्रकाश प्रदान कर सकते हैं. सोलर ट्री अपनी

 सफाई स्वयं करते हैं, जिनमें किसी प्रकार के क्षमता पर असर डालने वाले मलबे को साफ  करने के लिए वाटर

 स्प्रिंक्लर लगे हुए हैं.

                                                                                                                                                         (स्रोत www.innovate.mygov.in)

 

 

अटल नवाचार मिशन

उद्देश्य

नवाचार और उद्यमिता की संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने स्वरोज़गार और प्रतिभा उपयोग सहित (सेतु) सहित  अटल नवाचार मिशन (एआईएम), कार्यक्रम शुरू किया है. इसका उद्देश्य विश्व स्तरीय नवाचार केंद्रों के प्रोत्साहन, बड़ी चुनौतियों के लिए उद्यमियों को प्रोरित करने, नया व्यापार (स्टार्ट-अप) प्रारंभ करने और स्वरोज़गार गतिविधियों, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी संचालित क्षेत्रों में स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के लिए एक प्लेटफार्म के रूप में काम करना है.

अटल नवाचार मिशन के दो प्रमुख कार्य हैं: स्वरोज़गार और प्रतिभा उपयोग के जरिए उद्यमिता को प्रोत्साहित करना, जिसमें आविष्कारकों को सफल उद्यमी बनने के लिए सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है. इसका दूसरा कार्य नवाचार संवर्धन है, जिसमें नए विचारों के सृजन के लिए एक मंच उपलब्ध कराया जाता है. अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाओं और अटल इन्क्यूबेशन सेंटरों के जरिए स्थापित इन्क्यूबेटरों को मदद प्रदान की जाती है.

 

इम्प्रिंट-2 के लिए कुल मिलाकर 2018-19 से 2021-22 तक परिव्यय राशि लगभग 670 करोड़ रुपये रखी गई है. इसमें मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग आधा-आधा वहन करेंगे. इम्प्रिंट-1 की तरह इम्प्रिंट-2 के प्रति भी काफी उत्साह देखा गया है. शुरुआती 2145 प्रस्तावों में से 549 को छांटने के बाद, तीन महीने की कठिन समीक्षा के दौर के पश्चात् अंतत: केवल 122 प्रस्तावों को वित्त पोषण के लिए चुना गया. परियोजनाओं की समीक्षा और ज्ञान प्रबंधन के लिए भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी की विशेषज्ञ सूची के विशेषज्ञों सहित 500 से अधिक विशेषज्ञों की मदद ली गई. इम्प्रिंट-2 को मुख्यत: निम्न उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं:

·         विभिन्न क्षेत्रों में पहचान की गई चुनौतियों से निपटने के लिए उत्पादों/प्रक्रियाओं और विकास में सक्षम प्रौद्योगिकी का विकास. 

·         विभिन्न संबद्ध मंत्रालयों द्वारा प्रौद्योगिकी पर जोर देने के लिए चुने गए क्षेत्रों पर केंद्रित रूपांतरित परियोजनाएं बनाना और उन्हें आगे बढ़ाना.

·         प्रौद्योगिकी को उद्योगों और हितधारकों तक पहुंचाने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के नए तरीके विकसित करना. 

·         प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियों और कमियों की निरंतर निगरानी तथा परिशोधन और संबद्ध मंत्रलयों/उद्योग से फीड बैक एकत्र करना. 

·         शोध के लाभ उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाने के लिए परियोजनाओं और कार्यक्रमों को राज्यों और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना. 

·         मांग और आपूर्ति के बीच अंतर को पाटने के लिए, विभिन्न उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों में पहचान किए गए क्षेत्रों में क्षमता तथा सामथ्र्य बढ़ाने के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराना. परियोजनाओं के बारे में प्रारंभिक और अंतिम प्रस्ताव भेजने के लिए अवसरों, निर्देशों, पात्रता, समीक्षा/निगरानी व्यवस्था और प्रारूप/प्रक्रिया के बारे में व्यापक जानकारी इम्प्रिंट की वेबसाइट (www. IMPRINT-2.in). और www. imprintindia.org) पर उपलब्ध है. प्रदूषण, कचरा प्रबंधन, स्वास्थ्य देखभाल, व्यक्तिगत सुरक्षा इत्यादि चुनौतियों से निपटने में मदद के लिए जल्द ही इम्प्रिंट-2 का विस्तृत संस्करण शुरू किया जाएगा.

            निष्कर्ष

ज्ञान आधारित समाज के मौजूदा समय में विज्ञान अब केवल जिज्ञासा संचालित कार्य नहीं है बल्कि इसे एक मूलभूत आवश्यकता समझा जाता है और ज़ोर दिया जाता है कि इंजीनियरिंग आविष्कारों और प्रौद्योगिकीय नवाचार के जरिए इस ज्ञान को समाज के हित में इस्तेमाल किया जाए. वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होती है. नतीजे अधिकतर धीमे लेकिन वृद्धिशील हैं और कई बार अवरोध मिसाल बनकर नए रास्ते तथा अवसर उपलब्ध कराते हैं. नवाचार जीवन में विकास और प्रगति का पर्याय बन गया है. शिक्षा न केवल नए-नए शोधों और उनके नतीजों के लाभ उठाने के लिए लोगों को प्रभावी रूप से प्रशिक्षित करने का एकमात्र तरीका है बल्कि यह हमारे साथ-साथ भावी पीढिय़ों के लिए भी वातावरण को बेहतर, सुरक्षित और स्वस्थ बनाने में लोगों को सक्रिय भागीदार और योगदान करने में सक्षम बनाती है.

ई-मेल आईडी imanna@metal.iitkgp.ac.in

 

यह लेख  योजनापत्रिका के जनवरी, 2019के अंक से लिया गया है, जो नवप्रवर्तन थीमको समर्पित है. विवरण के लिए visit www.yojana.gov.in.देखें.