विशेष लेख


Special article vol.29

खुले में शौच से मुक्त वातावरण और आजीविका के अवसरों का सृजन

इंदिरा खुराना

जल, स्वच्छता और सफाई (वॉश) बेहतर स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति सहित विभिन्न स्तरों पर जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले मानव विकास के शक्तिशाली संचालकों में शामिल हैं। खुले में शौच की प्रथा से वर्तमान और भावी पीढिय़ों की भलाई और गरिमा पर गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। इसे समाप्त करने के लिये सुरक्षित, किफायती, सुलभ और उपयुक्त स्वच्छता सुविधाएं होना अनिवार्य है।

साफ-सफाई का महत्व

जल, स्वच्छता और सफाई (वॉश) की खाद्य और पोषक तत्वों के अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह गऱीबी उन्मूलन और सामजिक आर्थिक विकास तथा शिशु और मातृ मृत्यु दर को घटाने का एक प्रमुख निर्धारक होता है।

उदाहरण के लिये जल, स्वच्छता और सफाई (वॉश) के अभाव में निम्नलिखित परिणाम सामने आते हैं:

*महिलाओं और बच्चों में रोगनिरोधक क्षमता की कमी से अधिक संक्रमण होता है। अपर्याप्त पानी और स्वच्छता सुविधाओं, लौह तत्वों के कम सेवन के कारण खून की कमी, पराश्रयी दबाव के कारण खून की कमी, पर्यावरणीय और व्यक्तिगत स्वच्छता में कमी तेज़ी से स्वास्थ्य संबंधी संक्रमण, विशेषकर पेट के कीड़ों के पारेषण में योगदान करती है, जिससे महिलाओं में खून की अत्यधिक कमी हो जाती है।

*भ्रूण विकार, जिसके कारण गर्भवती महिलाओं के लिये गर्भपात और मृत प्रसव की स्थिति उत्पन्न होती है।

*दुनिया में 50 प्रतिशत कम वजनी बच्चों के लिये असुरक्षित पानी, स्वच्छता का अभाव और अपर्याप्त साफ-सफाई जिम्मेदार है। भारत में 59 प्रतिशत बच्चे अविकसित और 42 प्रतिशत कम वजन के हैं। असुरक्षित पेयजल, अपर्याप्त स्वच्छता और अपर्याप्त साफ-सफाई की वजह से कुपोषण का शिकार बच्चे अन्य संक्रामक बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

*दक्षिण एशिया में बच्चों की न्यूमोनिया से होने वाली 22 प्रतिशत मौतों के बाद डायरिया दूसरा सबसे बड़ा घातक अर्थात 11 प्रतिशत मौतों के लिये जिम्मेदार है। भारत में अकेले 5 वर्ष से नीचे के 13 प्रतिशत बच्चों की  मृत्यु डायरिया के कारण होती है। अन्य बीमारियों में हैजा, पीलिया, कीड़ों का प्रकोप है। हाल के शोध से पता चलता है कि स्वच्छता की खराब स्थिति का प्रभाव पोषण और विकास पहले के अनुमान से कहीं अधिक है। स्वच्छता सुविधाओं के अभाव ने भीे कम वजनी और शारीरिक तथा मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों के जन्म में योगदान किया है।

*अनीमिया के अधिक मामले: एशिया और अफ्रीका का उच्च जोखिम समूहों में पूर्ण अनीमिया का 85 प्रतिशत से अधिक का योगदान है और इसके साथ ही भारत में 5 वर्ष की आयु के करीब 40 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी पाई जाती है।

*महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा। ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम 17 प्रतिशत महिलाओं को अपने परिवारों और मवेशियों के लिये पानी हासिल करने के लिये एक से अधिक कि।मी। पैदल चलना पड़ता है और इनमें से 55 प्रतिशत खुले में स्नान करने को मज़बूर हैं क्योंकि उनके पास कोई निजी स्नानगृह नहीं है और वे खुले में शौच करने पर भी मज़बूर हैं। पुलिस सूत्रों के अनुसार 2012 में बिहार में बलात्कार के 40 प्रतिशत मामले उस वक्त घटित हुए जब महिलाएं शौच करने के लिये बाहर गई थीं।

महिलाओं पर बढ़ता कामकाज का बोझ और उनकी अन्य उत्पादक/आर्थिक गतिविधियों में संलग्नता के लिये परिणामी असमर्थता।

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) की शुरूआत प्रधानमंत्री ने सामूहिक स्वच्छता कवरेज और इसे महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के साथ जोड़ते हुए 2 अक्तूबर, 2019 तक एक स्वच्छ भारत के निर्माण के उद्देश्य के साथ 2 अक्तूबर, 2014 को की थी।

तब से लेकर स्वच्छ भारत मिशन और साफ-सफाई में महत्वपूर्ण व्यक्तियों, गैर सरकारी संगठनों, कार्पोरेट्स और अन्य लोगों ने इसके साथ जुडक़र इसमें बहुत योगदान किया है।

राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए पेयजल और स्वच्छता मंत्री (पेयजल और स्वच्छता के लिये जि़म्मेदार मंत्रालय) ने कहा कि 27 जुलाई 2016 के अनुसार 17 जिलों, 223 खण्डों, 31077 ग्राम पंचायतों ने अपने आप को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया।

20 सितंबर, 2016 की स्थिति के अनुसार 5495 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या के पास शौचालयों की सुविधा है और 83038 गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 597608 गांव हैं। इस प्रकार शौचालय कवरेज में दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि हुई है, सभी को शौचालय उपलब्ध करवाने की यात्रा संपूर्णता से बहुत दूर है। जिलों के मामले में 23 जिले खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं: 600 से अधिक जिलों को भी यह दर्जा हासिल करने की आवश्यकता है।

स्वच्छता के क्षेत्र में आजीविका के अवसर

स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के एक महत्वपूर्ण तथ्य की बहुत कम लोगों को जानकारी है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजग़ार और आजीविका के अवसर इससे जुड़े हैं जिन्हें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में यह मिशन उपलब्ध करवाता है।

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) को लीजिए, संपूर्ण आंदोलन मांग के सृजन और आपूर्ति की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। मांग किस प्रकार सृजित होती है? लोगों में जागरूकता पैदा करके, उन्हें शौचालयों का इस्तेमाल करने और व्यवहार में बदलाव लाने के लिये प्रेरित करके। इसमें अग्रणी पंक्ति के कार्यकर्ताओं और स्वयं सहायता समूहों सहित ग्रामीण समुदाय को संलग्न करना शामिल है। इसके लिये वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु दिशानिर्देशों में प्रावधान है। ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ताओं को प्रत्येक शौचालय के निर्माण के लिये प्रोत्साहन दिया जाता है जिसका निर्माण उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप हुआ है।

शौचालय निर्माण में एक प्रमुख बाधा आवश्यक हार्डवेयर और निर्माण सहायता प्रदान करने के लिये आपूर्ति शृंखलाओं का अभाव है। शौचालयों के निर्माण के लिये पैन्स और आरसीसी रिंग्स जैसे हार्डवेयर कम्पोनेंट्स की आवश्यकता होती है। उपयुक्त हार्डवेयर विकल्पों और इनकी उपलब्धता और राजमिस्त्री, जो कि शौचालय का निर्माण करते हैं, के बारे में सूचना आसानी से उपलब्ध नहीं होती है। इनमें सुधार की आवश्यकता है। इन आपूर्ति इकाइयों की स्थापना सुविधाजनक और आसान पहुंच की दूरी पर ही किये जाने की आवश्यकता है, विशेषकर ये भौगौलिकीय चुनौतियों और कठिन क्षेत्रों में पहुंच के अनुसार होनी चाहिये, ताकि सुरक्षित शौच की अवधारणा को मूर्तरूप प्रदान किया जा सके।

इस हार्डवेयर आवश्यकता को पूरा करने की उत्पादन सुविधा की स्थापना गांवों को लघु उद्यम लगाने के अवसर प्रदान करती है।

शौचालयों के निर्माण के लिये कुशल राजमिस्त्री की सेवाओं की आवश्यकता होती है जो कि शौचालय का एक फीस के साथ निर्माण करता है। कई राज्यों में कुशल राजमिस्त्रयों को तैयार किया गया हैै जो फीस के साथ अपनी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं।

उदाहरण के लिये, ओड़ीशा में, स्थानीय मांग और निकटवर्ती गांवों की मांग को पूरा करने के लिये हार्डवेयर आपूर्ति इकाइयों की स्थापना स्वयं सहायता समूहों ने की है।

वॉश अकादमियां, जिन्हें परिमल प्रतिष्ठानों के तौर पर जाना जाता है, समुदाय, विशेषकर महिला स्वयं सहायता समूहों के भीतर समुदाय के स्वामित्व और संचालन के अंतर्गत वॉश गतिविधियों के लिये वन-स्टाप-शॉप सह संसाधान केंद्र हैं।

कालाहांडी और कंधमाल में शुरू की गई वॉश अकादमियों को महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा लाभ सृजन व्यवसायों के तौर पर कार्य करने हेतु डिज़ाइन किया गया है। स्वयं सहायता समूह सीधे तौर पर सामग्रियों के उत्पादन और बिक्री, प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों की आपूर्ति और निरंतर स्थानीय मांग के सृजन में सीधे तौर पर संलग्न हैं। परिमल प्रतिष्ठान समुदाय, विशेषकर महिला स्वयं सहायता समूहों के भीतर समुदाय के स्वामित्व और संचालन के अंतर्गत वॉश गतिविधियों के लिये वन-स्टाप-शॉप सह संसाधान केंद्र हैं। परिमल प्रतिष्ठान की गतिविधियों में शामिल हंै:-

*गुणवत्तापूर्ण और पर्यावरण अनुकूल स्वच्छता सामग्री का उत्पादन

*प्रशिक्षित राजमिस्त्रियों का रोस्टर

*प्रसार-प्रचार के लिये स्थानीय स्तर पर उपयुक्त आईईसी सामग्रियां

*स्थल विनिर्दिष्ट शौचालय डिज़ाइन (ड्राईंग्स, लागत अनुमान)

परिमल प्रतिष्ठान, कालाहांडी

बलरामपुर गांव, भवानीपटना, कालाहांडी स्थित महालक्ष्मी परिमल प्रतिष्ठान (वॉश एकेडमी) स्वच्छता आंदोलन में आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन में योगदान कर रहा है। अकादमी का प्रबंधन छह अलग अलग गांवों, बलरामपुर, श्रद्धापुर, मेदिनिपुर, जगनाथपुर, गुडियालिपडार और सरलांजी से संबंधित महालक्ष्मी प्राथमिक पानीपरिबा उत्पादनकारी समाबाया लिमिटेड के स्वयं सहायता समूह सदस्यों द्वारा किया जाता है। यह स्वयं सहायता समूह परिसंघ एक सहकारी संस्था के तौर पर पंजीकृत है और महालक्ष्मी सब्जी उत्पादक सहकारी लिमिटेड के तौर पर भी पंजीकृत है। उत्पाद हार्डवेयर आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बेचे जाते हैं। 30 प्रशिक्षित राजमिस्त्री शौचालयों के निर्माण के लिये अपनी सेवाएं सक्रियता से प्रदान करते हैं।

परिमल प्रतिष्ठान, कंधमाल

कंधमाल में मां बादुवारी महिला संघ नामक स्वयं सहायता समूह परिसंघ है, जिसकी स्थापना मालेरिमाहा गांव, टीकाबाली ब्लॉक में वॉश एकेडमी के संचालन के लिये की गई है। सचिव, सरोजिनी देउरी समुदाय नेतृत्व स्वच्छता में एक प्रशिक्षित व्यक्ति है और यह समूह शौचालयों के निर्माण और इस्तेमाल को प्रोत्साहन देने के काम में पहले से सक्रिय है। उनका जुनून, समर्पण और परोपकार की भावना इस तथ्य में निहित है कि उसने 1 रु प्रति माह के टोकन किराये पर वॉश एकेडमी की स्थापना और प्रचालन के लिये समूचा बैकयार्ड दे दिया। उसके लिये उसके गांव और आसपास के क्षेत्रों का विकास पर्याप्त प्रतिफल है।

ये वॉश अकादमियां सामग्रियों का उत्पादन कर रही है जिन्हें शौचालयों के निर्माण में व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। ये हैं: कम्प्रेशड स्टेबिलाइज़्ड अर्थ ब्लॉक्स, आरसीसी रिंग्स और पिट कवर्स। इस अकादमी से जुड़े 50 प्रशिक्षित राजमिस्त्री शौचालय निर्माण के लिये अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

निष्कर्ष

स्वच्छ भारत का निर्माण और खुले में शौच की प्रथा को भारत के कोने-कोने और शहरी परिदृश्य से हटाने का कार्य प्रेरणादायक और चुनौतीपूर्ण है तथा स्वच्छ वातावरण, बीमारियों में कमी लाने और स्वस्थ बच्चों के रूप में अपेक्षित परिणाम हासिल किये जाने चाहियें। यद्यपि कवरेज की प्रगति को त्वरित किये जाने की आवश्यकता है, खुले में शौच के उन्मूलन और सुरक्षित तथा स्वास्थ्यप्रद वातावरण के सृजन के लिये शौचालयों का सतत उपयोग और अनुरक्षण सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। शोध में खुले में शौच के व्यवहार की ओर लौटने की सूचना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसी वजह से सभी स्तरों पर अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है। यदि हम सब इस दिशा में काम करें तो स्वच्छ भारत का सपना पूरा हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि ये यात्रा साथ ही साथ आजीविका के अवसर भी प्रदान करेगी जो इससे भी आगे जारी रहेंगे।

 

(लेखक पीएचडी, प्रमुख लेखक, स्वच्छता और सफाई, आईपीई ग्लोबल लिमिटेड से हैं। ई-मेल: dr.indira.khurana@gmail.com)