विशेष लेख


Volume 2, 2017

डॉ. आम्बेडकर की बौद्धिक ईमानदारी

डॉ. उदित राज

ये आम धारणा है कि सच्चाई अक्सर कष्टदायी होती है परंतु इसकी कभी हार नहीं होती और अंतत: सदैव इसकी जीत होती है. डा. बी. आर. आम्बेडकर के मामले में, इस कथन का अभी साक्ष्य होना है. हर चीज़ के बावजूद, वह बौद्धिक रूप से ईमानदार और सदैव सही और गलत के बारे में मुखर थे, प्रतिक्रियाओं के बावजूद, वे सदैव महिलाओं की आज़ादी, जातिप्रथा के अंत और अंधविश्वासों को तोडऩे के लिये अग्रणी बने रहते थे. यहां तक कि बौद्ध धर्म ग्रहण करते हुए भी उन्होंने केवल मानव कल्याण की बात की और धर्म के मामलों में इतने बड़े पैमाने पर संलग्न रहना, ज्ञानमीमांसीय तथा आध्यात्मिक बहस में उलझने की बजाए मानवता की भलाई के लिये प्रतिबद्धता बनाये रखना असंभव से भी आगे की बात है. कई बार बौद्धिक ईमानदारी गंतव्य तक पहुंचने में एक बाधा बन जाती है. अत: यह एक प्रसिद्ध कहावत है कि हरेक महान सितारे के पीछे एक बड़ा अपराध होता है. मेरे विचार में हेनोरी-डे बलजैक का ऐसा कहना अनुचित नहीं था.
डा. आम्बेडकर ने अधिष्ठापन की परवाह नहीं की, जब वे सच्चाई के लिये प्रयास करते थे. बेटियों के लिये संपत्ति के समान अधिकार के लिये खड़ा होना पचास के दशक में उतना आसान नहीं था. ये स्वाभाविक था कि जो भी संपत्ति में समान अधिकारों की बात करेगा लोग उसके खिलाफ  खड़े हो जायेंगे. डा. आम्बेडकर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ सलाह मशविरा करके संसद में हिंदू संहिता विधेयक पेश कर दिया. हिंदू संहिता विधेयक में पैतृक संपत्ति में बेटों और बेटियों के लिये समान हिस्सेदारी का प्रावधान रखा गया था. इस विधेयक को लेकर देश में व्यापक आलोचना हुई, जिसके कारण कांग्रेस पार्टी को संसद में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद इस प्रस्ताव से पीछे हटना पड़ा और विधेयक नामंजूर हो गया.
इसी प्रकार जब शेख अब्दुला और अन्य समान विचारधारा के लोगों ने नेहरू जी से संविधान में जम्मू एवं कश्मीर के लिये विशेष प्रावधान शामिल किये जाने को लेकर संपर्क किया, वे सहमत हो गये, परंतु सुझाव दिया कि उन्हें समझौते के लिये डा. बी. आर. आम्बेडकर से मिलना चाहिये. जब शेख अब्दुल्ला ने डा. आम्बेडकर से मुलाकात की, तो उन्होंने दो टूक जवाब दे दिया कि यदि एक सीमावर्ती राज्य के तौर पर जम्मू एवं कश्मीर को विशेष प्रावधान प्राप्त होने चाहियें, तो बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बंगाल और पूर्वोत्तर के प्रांत, जो कि समान तरह से सीमावर्ती राज्य हैं, को भी समान तरह के विशेष प्रावधान प्राप्त होने चाहिये. इसके बाद भी अनुच्छेद 370 तैयार कर लिया गया परंतु डा. आम्बेडकर ने नहीं किया था. डा. आम्बेडकर ने संविधान के अधिकतर प्रावधान लिखे थे, परंतु उन्हें अनुच्छेद 370 लिखने की अनुमति नहीं दी गई और न ही उन्होंनेे इसका समर्थन किया.
डा. आम्बेडकर जातिगत व्यवस्था को समाप्त करने लिये डटे रहे थे, क्या उनके अनुयायी ऐसा कर रहे हैं? उलटे, जातिगत पहचान और समेकन के लिये सक्रियता जारी है. जातियों की पहचान सृजित करते हुए व्यक्तिगत लाभ लेना और संस्थानों तथा सरकार में सत्ता हथियाना ज्यादा आसान है. किसी न किसी प्रकार, जो सच्चाई वे लाना चाहते थे अपना स्थान हासिल नहीं कर पाई.
12 दिसंबर 1935 को बाबासाहेब को लाहौर में जाट टोडक मंडल से एक पत्र प्राप्त हुए जिसमें उन्हें अपना अध्यक्ष बनने के लिये आमंत्रित किया गया था. उन्होंने सोचा कि यह ऊंची जाति के हिंदुओं की एसोसिएशन है जिनका एकमात्र विचार जाति व्यवस्था में सुधार करना था. पहले तो डा. आम्बेडकर ने निमंत्रण को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया परंतु बाद में जब उनसे अनुरोध किया गया तो उन्होंने अपनी सहमति दे दी. एसोसिएशन की बैठक ईस्टर के दौरान होने वाली थी परंतु इसे मई 1936 तक के लिये स्थगित कर दिया गया.
इसके बाद, डा. आम्बेडकर को आमंत्रित करने को लेकर लाहौर में जबर्दस्त असंतोष पैदा हो गया और भाई परमानंद, पूर्व अध्यक्ष, हिंदू महासभा, महात्मा हंसराज, स्थानीय संपत्ति स्वामित्व मंत्रियों डा. गोकुलचंद नारंग और राजा राजेंद्रनाथ एमएनसी ने मंडल सचिव संतराम को संगठन से अलग थलग कर दिया. मंडल के नेतागण डा. आम्बेडकर के भाषण का लिखित अग्रिम मसौदा चाहते थे, डा. आम्बेडकर पर सम्मेलन से पहले लाहौर में समीक्षित ‘‘जाति का अंत‘‘ शीर्षक पर निबंध प्राप्त करने को लेकर जबर्दस्त दबाव था, परंतु वे दृढ़ बने रहे. उनके निबंध को देखकर मंडल के हर भगवान को विषयवस्तु जानने के लिये मुंबई भेजा गया, इसे पढऩे के बाद वे बेचैन हो गये और डा. आम्बेडकर से निबंध में बदलाव करने का सुझाव दिया और इसे संक्षिप्त बनाने को कहा, परंतु डा. आम्बेडकर झुके नहीं, परिणामस्वरूप सम्मेलन को स्थगित कर दिया गया.
किसी को भी यह मालूम होना चाहिये कि उस अवधि के दौरान लाहौर उत्तर पश्चिम भारत का केंद्र था और यदि डा. आम्बेडकर मंडल के सुझावों से सहमत हो जाते, बड़े पैमाने पर ऊंची जाति के हिंदुओं ने उनका नेतृत्व स्वीकार कर लिया होता. वे प्रलोभन में नहीं आये और बाद में उनका निबंध ‘‘जाति का अंत‘‘ मुंबई में प्रकाशित हुआ और कई अन्य भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ.
उनकी सच्चाई अब तक भी प्रयोगसिद्ध नहीं है. बौद्धिक ईमानदारी बनाये रखना किसी के लिये भी अपने को जोखिम में डालना है और इसके लिये ऊंची कीमत चुकानी पड़ सकती है. इसकी कोई निश्चितता नहीं है कि डा. आम्बेडकर की सच्चाई को समाहित किया गया, व्यवहार में अपनाया गया है अथवा उस पर चर्चा भी की जाती है. सामान्यत: लोग बदलाव के खिलाफ  होते हैं और जरूरी नहीं कि सच्चाई सदैव कायम रहे. कबीर जैसे कुछ नीति उपदेशक रहे हैं जिन्होंने सच्चाई की बात की परंतु वे पुस्तकों और बातों तक ही सीमित होकर रह गये, बहुत कम लोग व्यवहार में उनका पालन करते हैं.
यही सच्चाई डा. आम्बेडकर को सताती रही और अब भी लोगों ने इसे समझा और आत्मसात नहीं किया है, यहां तक कि दबे कुचले लोगों ने भी ऐसा नहीं किया. यदि दबे कुचले लोगों ने उनके सच्चाई के मार्ग को अपनाया होता, यदि संपूर्ण नहीं तो, कम से कम आंशिक सफलता उन्हें हासिल हो जाती. यह कोई जरूरी नहीं है कि अब तक जो कुछ नहीं हुआ है, कल नहीं किया जा सकता है. उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है जब जाति रहित समाज की स्थापना होगी और भारत विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल हो जायेगा.
(लेखक लोकसभा में संसद के सदस्य हैं) उनके द्वारा व्यक्त विचार अपने हैं.
चित्र: गूगल के सौजन्य से