विशेष लेख


Volume-4

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की प्रमुख विशेषताएं

श्वेता

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में दावा किया है कि दुनिया भर में 300 मिलियन लोग अवसाद से ग्रसित हैं जिसमें 2005 और 2015 के बीच 18त्न की वृद्धि हुई है. भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. हेंक बेकेडम ने एक इंटरव्यू में कहा कि 2015 में 56 मिलियन भारतीय अवसाद से ग्रसित हुए जो कि देश की जनसंख्या का करीब 4.5त्न है. यद्यपि देश में मानसिक बीमारी से पीडि़त लोगों का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन भारत के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार शहरी कामकाजी जनसंख्या में 13.13 प्रतिशत जीवनपर्यन्त अवसाद प्रधानता की मौजूदगी 7.07त्न पाई गई. 2016 लेसेंट रिपोर्ट के अनुसार, देश में दस में से केवल एक रोगी के मानसिक स्वास्थ्य का इलाज होता है. भारत में प्रति 1,00,000 लोगों पर 0.3 मनोचिकित्सक हैं. रिपोर्ट के अनुसार देश में मात्र 443 सार्वजनिक मानसिक अस्पताल हैं, और छह राज्य, मुख्यत: उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में 56 मिलियन लोगों की संयुक्त जनसंख्या के साथ, एक भी मानसिक अस्पताल नहीं है.
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने ताज़ा मासिक रेडियो प्रसारण, ‘मन की बातमें मानसिक स्वास्थ्य और अवसाद के मुद्दे पर प्रकाश डाला था और अवसाद से ग्रसित लोगों के इलाज के महत्व के बारे में चर्चा की थी.
पिछले तीन वर्षों में एनडीए सरकार ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार को लेकर अनेक कदम उठाये हैं. 28 मार्च, 2017 को संसद ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक, 2016 को पारित किया जो कि मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 का स्थान लेगा. विधेयक को राज्य सभा पहले ही अगस्त, 2016 में मंजूरी दे चुकी है. 7 अप्रैल, 2017 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाने के बाद मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 लागू हो गया है.
अधिनियम का उद्देश्य मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के लिये मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और सेवाएं उपलब्ध करवाना, ऐसे व्यक्तियों की मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और सेवाओं की डिलीवरी और इससे जुड़े मामलों अथवा इनसे संबद्ध घटनाओं के दौरान उनके अधिकारों को संरक्षा, प्रोत्साहन और पूर्णता प्रदान करना है. अधिनियम को नि:शक्त व्यक्तियों के अधिकार सम्मेलन और इसके ऐच्छिक प्रोटोकॉल के अनुरूप तैयार किया गया जिसे संयुक्त राष्ट्र ने 13 दिसंबर, 2006 को न्यूयार्क में स्वीकार किया था और 3 मई, 2008 को यह लागू हुआ था. भारत ने इस समझौते पर 2007 में हस्ताक्षर किये और इसकी पुष्टि की थी जिससे मौजूदा कानूनों को समझौते के अनुरूप और सुसंगत बनाने की आवश्यकता थी.
अधिनियम में ‘‘मानसिक बीमारी‘‘ को सोच, मनोदशा, धारणा, अभिविन्याश या स्मृति जो मोटे तौर पर जीवन की सामान्य जरूरत के लिये निर्णय, व्यवहारवास्तविकता को पहचानने की क्षमता या योग्यता में अवरोध पैदा करती है, मदिरा और मादक पदार्थों की लत से जुड़ी मानसिक स्थिति के महत्वपूर्ण विकार के तौर पर परिभाषित किया गया है. लेकिन इसमें मानसिक मंदता को शामिल नहीं किया गया है जो कि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क के अविकास या अपूर्ण विकास, विशेषकर मंद बुद्धिमत्ता की स्थिति होती है.
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 में कहा गया है कि मानसिक बीमारी का निर्धारण विश्व स्वास्थ्य संगठन के रोग संबंधी अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण के नवीनतम संस्करण सहित राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय तौर पर स्वीकार्य चिकित्सा मानदंडों के अनुरूप किया जायेगा.
राजनीतिक, आर्थिक या सामाजिक स्थिति अथवा सांस्कृतिक, जातीय अथवा धार्मिक समूह की सदस्यता किसी व्यक्ति की मानसिक बीमारी के निर्धारण का आधार नहीं हो सकती. नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, कार्य या राजनीतिक मूल्य अथवा किसी व्यक्ति के समुदाय में मौजूद मान्यताएं भी मानसिक बीमारी के निर्धारण का कारण नहीं हो सकती हैं.
मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों के अधिकार
अधिनियम में प्रत्येक व्यक्ति को सरकार द्वारा संचालित अथवा वित्तपोषित मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से मानसिक स्वास्थ्य देखभाल और इलाज प्राप्त करने के अधिकार की गारंटी दी गई है. इससे किफायती लागत पर अच्छी गुणवत्ता की मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने में सहायता मिलेगी. इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं भौगोलिक रूप से उपलब्ध हैं और भेदभाव के बगैर उपलब्ध करवाई
जाती हैं.
मानसिक बीमारी से ग्रसित गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे अथवा बेसहारा व्यक्ति सरकार द्वारा संचालित या वित्तपोषित सभी मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं में बिना किसी प्रभार और वित्तीय लागत के मानसिक स्वास्थ्य इलाज और सेवाएं मुफ्त पाने के हकदार होंगे.
गोपनीयता का अधिकार: अधिनियम के अनुसार, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को उसके मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक देखभाल, इलाज और शारीरिक देखभाल के संबंध में गोपनीयता बनाये रखने का अधिकार होगा. इसमें मानसिक बीमारी के संबंध में सूचना जारी किये जाने पर भी प्रतिबंध है. मानसिक रूप से बीमार किसी व्यक्ति की सहमति के बगैर मानसिक स्वास्थ्य स्थापना द्वारा मीडिया को कोई सूचना जारी नहीं की जा सकती है. परंतु मानसिक बीमारी से ग्रसित ऐसे सभी व्यक्तियों को अपने बुनियादी चिकित्सा रिकार्ड प्राप्त करने का अधिकार होगा.
कानूनी सहायता का अधिकार: इसमें इस बात की भी गारंटी दी गई है कि मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त अपने किसी भी अधिकार के प्रयोग के लिये मुफ्त कानूनी सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार होगा.
अधिनियम में गरिमा के साथ जीवन जीने, समुदाय में रहने का अधिकार, व्यक्तिगत संपर्क और सम्प्रेषण का अधिकार, क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक उपचार से संरक्षा, शारीरिक विकलांग व्यक्तियों के समान इलाज के अधिकार को भी मान्यता प्रदान की गई है.
प्रत्येक बीमा कंपनी उसी प्रकार मानसिक बीमारी के उपचार के लिये चिकित्सा बीमा के लिये प्रावधान रखने को बाध्य है जैसा कि शारीरिक रूप से बीमार के इलाज के लिये उपलब्ध है.
उन्नत निर्देश
अधिनियम में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विनिर्दिष्ट करने का अधिकार होगा कि वह मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति में मानसिक बीमारी का इलाज किस प्रकार कराना चाहेगा. किसी भी व्यक्ति को यह विनिर्दिष्ट करने का भी अधिकार होगा कि उसके इलाज, अस्पताल में उसके प्रवेश आदि के संबंध में फैसला करने के लिये कौन व्यक्ति जिम्मेदार होगा.
इसमें यह भी कहा गया है कि कोई मेडिकल प्रेक्टिशनर अथवा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर को वैध उन्नत निर्देश का पालन करने पर किसी अप्रत्याशित दुष्परिणाम के लिये जिम्मेदार नहीं ठहराया जायेगा.
अधिनियम के अनुसार, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को मांसपेशी शिथिलता और एनेस्थिसिया का प्रयोग किये बिना विद्युत चिकित्सा प्रदान नहीं की जायेगी. साथ ही विद्युत चिकित्सा थेरेपी नाबालिग पर प्रयोग में नहीं लाई जायेगी. इसमें ऐसे व्यक्तियों के स्टरलाइजेशन पर भी प्रतिबंध लगाया गया है. उन्हें किसी भी स्थिति में किसी भी तरह अथवा प्रकार से, जो भी हो, चेन से बांधा नहीं जायेगा.
अधिनियम के अनुसार, मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को एकांत या एकांत कारावास में नहीं रखा जायेगा. केवल आवश्यक होने पर ही शारीरिक नियंत्रण का प्रयोग किया जा सकता है.
मानसिक स्वास्थ्य एवं निवारक कार्यक्रम का संवद्र्धन
अधिनियम में सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह देश में मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक रोग रोकथाम के संवद्र्धन के लिये कार्यक्रमों का नियोजन, डिजाइन और कार्यान्वयन करे. मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक बीमारी से जुड़े कलंक को हटाने के बारे में जागरूकता पैदा करने के उपाय किये जाने चाहिये.
अधिनियम के अनुसार सरकार देश में शैक्षणिक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की योजना, विकास और कार्यान्वयन से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की मानव संसाधन अपेक्षाओं को पूरा करने के उपाय करेगी. यह उच्चतर शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थानों के सहयोग से किया जायेगा. इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के लिये मानव संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाना और मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की आवश्यकताओं की बेहतर पूर्ति के लिये उपलब्ध मानव संसाधनों के कौशल में सुधार करना होगा.
अधिनियम के अनुसार, सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल स्थापनाओं में सभी चिकित्सा अधिकारियों और जेलों या कारावासों में सभी चिकित्सा अधिकारियों को बेसिक और आपातकालीन मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं प्रदान करने के वास्ते प्रशिक्षण प्रदान करेगी.
केंद्रीय और राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की स्थापना
अधिनियम में सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह राष्ट्रपति द्वारा अधिनियम की स्वीकृति प्रदान किये जाने के नौ माह की अवधि के भीतर एक केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण का गठन करे.
केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के कार्य: प्राधिकरण केंद्रीय सरकार के नियंत्रणाधीन सभी मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं का पंजीकरण करेगा. यह पंजीकरण स्थापनाओं के सभी राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों द्वारा उपलब्ध करवाई गई सूचना के आधार पर देश में सभी मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं का एक रजिस्टर बनायेगा और अद्यतन जानकारी संकलित करेगा और ऐसी स्थापनाओं के रजिस्टर को प्रकाशित करेगा.
प्राधिकरण केंद्रीय सरकार के अधीन विभिन्न प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं के लिये गुणवत्ता और सेवा प्रावधान नियम तैयार करेगा. यह केंद्रीय सरकार के अधीन सभी मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं का पर्यवेक्षण करेगा और सेवाओं की उपलब्धता में कमियों के बारे में शिकायतें प्राप्त करेगा. यह इस अधिनियम के उद्देश्य के लिये मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के तौर पर कार्य करने के लिये पंजीकृत व्यक्तियों क्लीनिकल मनोचिकित्सकों, मानसिक स्वास्थ्य नर्सों और मनोचिकित्सा सामाजिक कार्यकर्ताओं के बारे में सभी राज्य प्राधिकरणों द्वारा उपलब्ध करवाई कई सूचना के आधार पर एक राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करेगा और ऐसे पंजीकृत मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की सूची को प्रकाशित करेगा.
प्राधिकरण को इस अधिनियम के प्रावधानों और कार्यान्वयन के बारे में कानून प्रवर्तन अधिकारियों, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों और अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षित करने का भी काम सौंपा गया है. यह केंद्रीय सरकार को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अैर सेवाओं से संबंधित सभी मामलों पर सलाह भी देगा.
केंद्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण कोष के नाम से एक कोष का गठन किया जायेगा जिसमें केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को प्रदान किये गये अनुदानों और ऋणों तथा इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा प्राप्त किये गये प्रभारों को जमा किया जायेगा.
केंद्रीय प्राधिकरण पिछले वर्ष के दौरान अपनी गतिविधियों का पूरा लेखा-जोखा प्रदान करते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा और इसे केंद्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखेगी.
अधिनियम में सभी राज्य सरकारों को निदेशित किया गया है कि वे नौ महीनों की अवधि के भीतर राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण की स्थापना करें.
मानसिक स्वास्थ्य स्थापना
प्रत्येक मानसिक स्वास्थ्य स्थापना को संगत केंद्रीय अथवा राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ पंजीकृत किया जायेगा. पंजीकरण के लिये स्थापना को अधिनियम में निर्धारित विभिन्न पात्रता मानदंड पूरे करने होंगे.
मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण उसके पास पंजीकृत ऐसी मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं के एक रजिस्टर का रखरखाव करेगा, और इसे मानसिक स्वास्थ्य स्थापनाओं का रजिस्टर पुकारा जायेगा.
मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड
अधिनियम में कहा गया है कि राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्डों का गठन करेंगे जिसका अध्यक्ष जिला जज अथवा राज्य न्यायिक सेवाओं का कोई अधिकारी, जो कि जिला जज के तौर नियुक्ति हेतु अर्हता प्राप्त है अथवा कोई सेवानिवृत्त जिला जज होगा. बोर्ड के कार्य उन्नत निर्देश को रजिस्टर, समीक्षा, परिवर्तन, संशोधन या निरस्त करना, मनोनीत प्रतिनिधि की नियुक्ति, मानसिक रूप से बीमार किसी व्यक्ति अथवा उसके मनोनीत प्रतिनिधि अथवा किसी अन्य इच्छुक व्यक्ति से चिकित्सा अधिकारी या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, जो कि मानसिक स्थापना अथवा मानसिक स्वास्थ्य स्थापना का प्रभारी है, के निर्णय के विरुद्ध आवेदन को प्राप्त करना और उस पर निर्णय लेना होगा.
बोर्ड सूचना के अप्रकटन के संबंध में आवेदनों को भी प्राप्त करेगा और उन पर निर्णय लेगा, देखभाल और सेवाओं में कमियों के संबंध में शिकायतों की सुनवाई, व्यक्तियों अथवा जेलों के निरीक्षण और ऐसी जेल या कारावास में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी से स्पष्टीकरण भी प्राप्त करेगा.
अधिनियम में प्राधिकरण अथवा बोर्ड के निर्णय के खिलाफ किसी भी व्यक्ति अथवा इसके निर्णय से प्रभावित स्थापना द्वारा उच्च न्यायालय में ऐसे फैसले के तीस दिनों की अवधि के भीतर अपील करने का भी प्रावधान है.
अधिनियम में अन्य एजेंसियों की जिम्मेदारी भी निर्धारित की गई है अधिनियम के अनुसार पुलिस थाने का प्रत्येक प्रभारी अधिकारी पुलिस थाने की सीमाओं के भीतर व्यापक रूप से घूमते पाये जाने वाले व्यक्ति को अपनी सुरक्षा में लेगा जिसके बारे में यह विश्वास करने का आधार है कि उसे मानसिक बीमारी है और अपना खुद का ध्यान रखने में अक्षम हैै. इसमें अधिकारी को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह अपनी सीमाओं के भीतर किसी भी ऐसे व्यक्ति को संरक्षा में ले सकता है जिसके बारे में अधिकारी के पास यह विश्वास करने का आधार है कि उसके स्वयं के लिये अथवा अन्यों के लिये मानसिक बीमारी के कारण जोखिम होने की स्थिति है.
यदि मानसिक रूप से बीमार किसी व्यक्ति के साथ दुव्र्यवहार किया जाता है या उसे नजऱ अंदाज किया जाता है तो पुलिस थाने के अधिकारी, जहां ऐसा व्यक्ति निवास करता है, की यह ड्यूटी होगी कि उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करे जिसके कार्याधिकार क्षेत्र में मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति निवास करता है.
आत्महत्या से दोषमुक्तकरण
अधिनियम के अनुसार, आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को उस समय मानसिक रूप से बीमार माना जायेगा और पहले की तरह भारतीय दंड संहिता के अधीन दंडित नहीं किया जायेगा. सरकार का यह कत्र्तव्य होगा कि वह अत्यधिक तनाव में रहने वाले और आत्म हत्या की कोशिश करने वाले व्यक्ति की देखभाल, इलाज और पुनर्वास करे और आत्महत्या के प्रयास की घटनाओं के जोखिम के न्यूनीकरण के प्रयास करे.
लेखक पत्रकार हैं.
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चित्र: गूगल के सौजन्य से